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मानवता से नाता तोड रहा मानव

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मानवता से नाता तोड रहा मानव  जीवन में बढते आधुनिकता और मैट्रो सिटी में मनुष्य के बदलते स्वभाव और परिवेश ने उसे पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। पहले एक मानव दूसरे मानव को मार रहा था, गाली दे रहा था, हर कोई उंचाई पर पहुंचना चाह रहा था, दूसरे को नीचा दिखा रहा था। लेकिन समय के बदलते हालात ने परिवेश को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। अब मनुष्य किसी को मार नहीं रहा है, गाली नहीं दे रहा है, उसे अच्छाई की औ र चलने को प्रेरित नहीं कर रहा है बल्कि उसे छोड अर्थात उसका त्याग कर रहा है। चाहे रिश्ते में एक व्यक्ति दूसरे व्‍यक्ति का माता पिता, पति पत्नी या जन्म देनेवाले नवजात बच्चे की हो। आज कोई उसे सुधारता नहीं बल्कि उसे त्याग देता है। उक्त धटना इन्दौर से संबंधित है। दिन गुरूवार पूरा इन्दौर झमाझम बारिश से सरोबोर था। तेज बारिश और हवा के झोंके ने तपती धरती की आग को जैसे बुझा दिया हो। सबसे अच्छा समय देख नवजात ऋषिका को उसके पिता ने मुसलाधार बारिश में बच्ची के मुंह में कपडा ठूसकर उसे मरने के लिए तिंछा फाल पर फेंक दिया। बाद में इस धटना में बच्ची की मां का भी हाथ बताया गया। अखबारी खबरों के आधार ...
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Niranjan Kumar एम.फिल प्रथम छमाही के बाद से ही मैंने अध्यापन का कार्य मैंने DAVV, देवी अहिल्या विश्वविधालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला विभाग में अतिथि व्याख्याता के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया है। मेरे लिए यह खुशी की बात है कि कुछ दिनों पहले तक मैं यहां अध्ययनरत था और अब एक अध्यापक के रूप में कार ्य कर रहा हूं। मैं अपनी और से पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला के सभी गुरूजनों के प्रति आभार प्रकट करता हूं और यह भरोसा दिलाता हूं कि मैं आपकी उम्मीदों पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करूंगा।   माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता कॉलेज से सम्बद्ध पत्रकारिता कॉलेज   Virtual Voyage   Indore में अतिथि व्याख्याता के रूप में पढाना शुरू कर दिया था। अध्यापन के तौर पर यह मेरा प्रथम अनुभव था।

हिन्‍दी हैं हम वतन हैं हिन्‍दुस्‍तां हमारा।

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Add caption किसी ने सही ही कहा है नाम में क्या रखा है? भारत को भारत कहें या इंडिया क्या फर्क पडता है? नाम तो सिर्फ उस व्यक्ति, वस्तु की पहचान को इंगित करता है। भारतीय इतिहास कई वीर गाथाओं को अपने आप में समेटे हुए है। इतिहास यह दर्शाता है कि हम भारत की  यादों में लाश के साथ कफन बनकर आए हैं। लाश के अंतिम संस्कार के बाद कफन को उसके साथ दफना दिया जाता है या जला दिया जाता है। कुछ ऐसा ही प्रतित हो रहा है जैसे भारत की आत्मा और उसके कफन को सदा के लिए दफनाने या जलाने का प्रयास सरकार के द्वारा किया जा रहा है। बात भारतीय आजादी की हो या देश पर किसी तरह के संकट का सभी क्षेत्रों में संकटमोचन का काम हिन्दी ने किया है। भारत के ज्यादातर विद्धानों ने हिन्दी में काम किया है। आज भी भारत की आधी से ज्यादा आवादी हिन्दी में काम करना पसंद कर रही है। हिन्दी हैं हम बतन है हिन्दुस्तां हमारा। यह नारा वर्तमान समय में देखा जाए तो ऐसा लगता है जैसे अंधकार, सुनसान पहाडी इलाके में कोई विलाप कर अपने परिचित को बुला रहा है, किसी से मदद की गुहार लगा रहा हो लेकिन आज इसके आगे पीछे कोई नहीं है। जिसने जीवन भर...

Niranjan Kumar

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सत्ता की चाल पर कलम का नृत्य

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फेसबुक पर लिखने पढने वाले वर्ग में कुछ ज्यादा ही समझदार लोग हैं। आजादी के 67 साल के बाद भी सत्ता की मलाई खाने के फेरे में पढे लिखे समझदार लोगों को आज भी पता नहीं है कि उसका पलडा किस और है। सिक्के की उछाल में ह ेड या टेल होता है। लेकिन फेसबुक पर ज्यादा समझदार लोग हेड को भी अपने पक्ष में और टेल को भी अपने पक्ष में मानते हैं। दोनों मामलों को अपने हित के हिसाब से देखते हैं और सोचते हैं किसमें कितना फायदा है। भारत में शुरूआत से ही फायदे और घाटे की राजनीति के हिसाब से लोगों में बदलाव होता रहा है। लेकिन कलम की धार हमेशा किसी पार्टी या संस्थान के पक्ष या विपक्ष में चली है। वर्तमान समय में कलम की धार कुंद तो हुई ही है साथ ही कलम का वार भी धारदार नहीं रहा। कलम चलाने वाले लेखक सत्ता की चाल पर थिरकते हैं। पूरे देश को ज्ञान का पाठ पढाने वाले प्रोफेसर और देश के बडे पत्रकार जो सभी आमजन को रात में भी आईना दिखाने का काम करते हैं को 16वें लोकसभा चुनाव में भी ये पता नहीं है कि वे किस और हैं। कई लोग तो सत्ता की चाल पर कलम को नृत्‍य करवा रहे हैं। पत्रकार या प्रोफेसर महोदय से मेरा आग्रह है ...

अपना बहुमूल्‍य वोट दो और लोकतंत्र को लूटोतंत्र बनाओ।

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देश में 16वें लोकतंत्र का पर्व लोकसभा चुनाव अब समाप्ति की अौर बढ रहा है। इससे पहले हमने 15 बार लोकसभा का चुनाव किया अौर अपने अपने उम्मीदवार को जीता कर गांव की गली से संसद तक पहुंचाया। ज िसको गांव से संसद तक पहुंचाया वह उम्मीदवार गांव छोडकर शहर की अौर चल दिया। हरबार की तरह इस बार भी महांपर्व में आमजनता अपना बहुमूल्य‍ वोट देकर लोकतंत्र को मजबूत कर रही है। उम्मीदवारों का चयन जाती,धर्म,समप्रदाय के आधार पर हो रहा है, वोट का प्रतिशत बढाकर लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं, चुनावों में पार्टियों के द्रारा कुछ कर गुजरने की बात हो तो बिना नल के पानी लाने की बात, बिना सेक्स के बच्चे पैदा करना, अब पुरूष भी करेगा बच्चा पैदा, सभी परिवार को निशुल्क सालाना 25-25 लाख बिना काम किए हुए मिलेंगे, घर के सारे कामकाज के लिए रॉवर्ट की व्यवस्था प्रत्येक परिवार को सिर्फ पांच रूपए में, अब महिलाआें को आराम ही आराम इत्यादी और भी कई दावे हैं जो प्रत्येक चुनाव की तरह इसबार भी किया जा रहा है। लोकतंत्र के मुर्ख हमसभी मतदाता इस बार भी गुमराह होकर अपने मत को अधिकार समझकर किसी न किसी को अपना वोट दिया। सवाल वोट देने ...

मीडिया और राजनीति का रंग।

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होली का रंग आसानी से एक दो दिन में छुट जाता है, राजनीति का रंग राजनीति के समय चढता है और उतर जाता है, अपने चरित्र पर चढा रंग बर्षों नहीं उतरता है और वर्षों लगने के बाद चढता है। सभी लोग किसी न किसी रंग में रंगना ज रूर पसंद करता है। रंग काला ही क्‍यों न हो रंगना सब कोई चाहता है। काला रंग अंधकार का प्रतिक माना जाता है लेकिन इसका भी अपना अलग मजा है। काले का आस्तित्‍व सफेद पर टिका होता है। सामान्‍यत: माना जाता है कि काला रंग शुभ नहीं होता है लेकिन काली कमाई को कभी भी अशुभ नहीं माना जाता है। ।काला का अपना आकर्षण एवं महत्‍व है। फिर चाहे काला धन हो या काली कमाई इसका आकषर्ण और महत्‍व सबसे अलग होता है। आज मीडिया भी बाजार का रूप ले चुका है ऐसे में हर कोई बोली लगा रहा है। दूसरे को धटिया बताकर अपने को उत्‍कृष्‍ट बता रहा है। आम जनता और जनजनहित के मुद्धे तो काेसों पीछे छुट गए हैं। प्रिंट मीडिया हो या इलक्‍ट्रानिक मीडिया दिन भर मोदी, राहूल और केजरीवाल जी की प्रतिभा दिखाने में लगा है जैसे आज तक इन तीनों के अलावा कोई नेता पैदा लिया ही न हो। समय है, टेलीविजन चैनलों के टीआरपी की समाचार पत्र के प्र...